Thursday, August 10, 2017

बक्सर का युद्ध

प्लासी के युद्ध के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी एक शासक कंपनी बनना शुरू हो गई । इस युद्ध से प्राप्त संसाधनों के जरिए अंग्रेजों ने 1759 में बेदरा के युद्ध में डचों को और 1760 में वांडीवाश के युद्ध में फ्रांसीसियों को हरा दिया । प्लासी के युद्ध के बाद बंगाल का नवाब मीर जाफर बना । जो अंग्रेजों के हाथ की कठपुतली था । किंतु यह बात किसी को पता नहीं थी कि बंगाल की सत्ता अंग्रेजों के पास है । धीरे-धीरे लोगों को पता चला तो वहां के दरबारी मीरजाफर को 'क्लाइव का गधा' कहने लगे । क्योंकि क्लाइव और अंग्रेज अफसर मीरजाफर से जमकर रिश्वत बटोरते थे । धीरे-धीरे नवाब का खजाना खाली हो गया । किंतु अंग्रेजों की धन लूटने की प्यास बढ़ती जा रही थी । जिसकी पूर्ति करना मीरजाफर के बस में नहीं था । तो उसने अपनी सेना भेजकर किसानों और दप्तकारों को लूटना शुरु कर दिया । इससे पूरे बंगाल में भुकमरी और अराजकता फैलने लगी । इसी समय 1760 मे मीर जाफर का संरक्षक रोवर्ट क्लाइव इग्लैण्ड चला गया । और उसी समय मीर जाफर का उत्तराधिकारी उसका पुत्र मीरन बिजली के गिरने से मर गया । ऐसी स्थिति में अंग्रेजों ने 1760 में मीरजाफर के दामाद मीरकासिम को बंगाल का नया नवाब बना दिया । मीरकासिम एक योग्य वह गुणवान व्यक्ति था । वह अंग्रेजों के षडयंत्र और वातावरण से दूर रहना चाहता था । इसीलिए उसने सबसे पहले अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर पहुंचाई । फिर उसने अंग्रेजों के वफादार सैनिकों को नौकरी से हटा दिया । और उसने अपना नया भारतीय सैनिक संगठन बनाया । मुंगेर में उसने बम और हथियार बनाने वाला एक कारखाना खोला । मीरकासिम ने बिहार के सूबेदार रामनारायण की हत्या करवा दी थी क्योंकि वह अंग्रेजों से मिला हुआ था । मीर कासिम ने अंग्रेजों के अवैध कामों पर पाबंदी लगा दी । मीरकासिम ने देखा कि अंग्रेज गुमास्ते दस्तक (व्यापारिक चुंगी) का दुरूपयोग कर रहे हैं तो उसने गुस्से में आकर सभी के लिए व्यापारिक चुंगी समाप्त करवा दी । ऐसे निर्णय से कुछ अंग्रेज अधिकारी स्तब्ध रह गए तो कुछ बौखला गए । सभी अंग्रेजों ने मिलकर 1763 में मीर कासिम को युद्ध में हराकर मीर जाफर को दुबारा बंगाल का नवाव बना दिया । मीर जाफर दुष्ट देशद्रोही को 1765 मे कुष्ठ रोग होकर कुत्ते जैसी मौत मिली । मीरकासिम भागकर अवध चला गया । अवध का नवाब शुजाउद्दौला भी अंग्रेजों से नाराज था । और मुग़ल बादशाह शाहआलम भी दिल्ली से भागकर अवध में निवास कर रहा था । तीनो ने मिलकर 23 जून सन् 1764 को बक्सर नामक स्थान पर कंपनी की सेना से युद्ध छेड़ दिया । इसे युद्ध को 'बक्सर का युद्ध' कहते हैं । लगभग 3 घंटे में ही इस युद्ध का फैसला हो गया । जिसकी बाज़ी अंग्रेजों के हाथ में रही । मुगल सम्राट वह दोनों नवाब युद्ध में पराजित हुए । मीर कासिम को अंग्रेजों ने पकड़कर गंगा नदी में डुबोकर मार डाला । शाहआलम और शुजाउद्दौला ने क्लाइव के साथ मिलकर 16 अगस्त 1764 को इलाहाबाद की संधि कर ली । जिसके द्वारा अंग्रेजों को बंगाल बिहार और उड़ीसा में दीवानी के अधिकार मिल गए । इसे युद्ध ने निसंदेह भारत की हथेली पर दासता शब्द लिख दिया । जिसे स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही मिटाया जा सका । इस प्रकार मुगल बादसाह अंग्रेजों का ऋणी हो गया । और अवध उनका मित्र बन गया । अवध से मित्रता हो जाने के बाद अंग्रेजो को मराठों के आक्रमण का डर नहीं रहा ।अब अंग्रेजों ने दक्षिण भारत की तरफ अपनी दृष्टि डाली ।

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