Wednesday, August 9, 2017

प्लासी का युद्ध

बंगाल को हडपने की संपूर्ण जानकारी विश्व की सबसे बड़ी लाइब्रेरी में उपलब्ध है जो लंदन में है । इसमे भारत के गुलामी के समय के 20,000 दस्तावेज रखे है । इन दस्तावेजों के अनुसार जब अंंग्रेज बंगाल को हडपना चाहते थे उस समय अंग्रेजो के पास सिर्फ 300 सिपाही थे । और सिराजुद्दोला के पास 18,000 सैनिकों की बटालियन थी । किन्तु सिराजुद्दौला अपनी पूरी फौज को अंग्रेजो के खिलाफ एक साथ इसलिए नहीं भेज सकते थे क्योंकि उन्हें उत्तर से अफगानी शासक अहमद शाह दुर्रानी और पश्चिम से मराठों का खतरा हमेशा बना रहता था । फिर भी हमले की सूचना मिलते ही फोज की एक टुकडी के साथ मुर्शिदाबाद से 27 मील दूर प्लासी पहुंचे । अंग्रेजी सेना का सेनापति रॉबर्ट क्लाइव था । और सिराजुद्दोला का सेनापति मीरजाफर था । मीरजाफर अलीवर्दी खान का बहनोई था । वह बंगाल का सेनापति भी था । सिराजुद्दौला ने मीरजाफर की स्वामी भक्ति पर संदेह करके उसे बख्शी के पद से हटा दिया था । और मीर मदार को अपना विश्वासपात्र मानकर उसकी तरक्की की । जिससे मीर जाफर  भडक गया । और उसने जगत सेठ ( जगत सेठ का असली नाम फतेह चंद था । इसे बंगाल के सबसे धनी व्यापारी मालिक चंद ने गोद लिया था । दिल्ली के बाद शाह ने इस अमीर व्यापारी के पुत्र को जगत सेठ की उपाधि प्रदान की थी )से मिलकर सिराजुदौला की गद्दी को छीनने का एक योजना बनाई जो एक दिन सच हुई ।  उधर रोबर्ट क्लाइव सिराजुदौला से बंगाल को छीनने की योजना बनाने मे रात दिन सोचता तो है ।  लेकिन सिराजुदौला की सैना का सामना करने का उसके मन मे डर बैठ जाता है । और सोचता है कि यदि आमने-सामने का युद्ध हुआ तो हमें हारने मे एक घंटा भी नहीं लगेगा । इसलिए वह ब्रिटिश पार्लियामेंट को एक चिट्ठी लिखकर कहता है कि यदि बंगाल को जीतना है तो मुझे और सिपाही दिए जाएं । तो वहां से जवाब आया कि अभी हम नेपोलियन बोनापार्ट(यह फ्रांस एक महान सम्राट था । जो विश्व के महान सेनापतियों में गिना जाता था । इसने यूरोप के अधिकांश देशों को अपने अधीन कर लिया था । जो प्लासी के युद्ध के समय अंग्रेजों से लड़ रहा था । किंतु बाद में अंग्रेजों ने इसे वाटरली के युद्ध में पराजित कर मंट हैलन द्वीप के कारावास में डाल दिया था तथा वहीं पर इसे आर्सिनयां नामक विष देकर मरवा दिया था) से युद्ध लड़ रहे हैं । और बंगाल से ज्यादा हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है । इससे ज्यादा हम तुम्हें सिपाही तो नहीं मगर हथियार जरूर दे सकते हैं । क्लाइव सोच में पड़ गया । और उसने सोच-समझकर अपने दो जासूसों को बुलाकर कहता है कि जाकर तुम यह पता लगाओ कि सिराजुद्दोला की फौज में कोई ऐसा आदमी है जो रिश्वत और लालच के चक्कर में अपने देश से गद्दारी कर सके । जासूसों जाकर पता लगाकर कहते है कि सिराजुद्दौला की फौज का सेनापति मीर जाफर है । जो रिश्वत के नाम पर गद्दारी कर सकता है । और यदि उसे कुर्सी का लालच दे दिया जाए तो संपूर्ण बंगाल की सत्ता की चाबी को हमारे हाथ में दे सकता है । क्लाइव कहता है कि ठीक है उस आदमी को किसी भी प्रकार बहला-फुसलाकर अपनी तरफ मिलाओ । अब 10 जून 1757 को रोवर्ट क्लाइव और मीर जाफर के बीच एक संधि होती है । किंतु इस बात का सिराजुदौला को बिल्कुल भी पता नहीं चलता है । अब सिराजुदौला की तरफ से अंग्रेज़ो को लडाई छेडने का कोई बहाना नही मिलता है तो अंग्रेज अपनी तरफ से मीरजाफर के साथ मिलकर एक षड्यंत्र रचते है । और सिराजुद्दोला पर अलीनगर की संधि भंग करने का झूठा आरोप लगाते हैं । आरोप लगाकर क्लाइव सिराजुद्दौला की रियासत मुर्शिदाबाद की ओर सेना लेकर चल पडता है । 23 जून 1757 को नवाब सिराजुद्दौला और क्लाइव के बीच पानीपत के मैदान में घमासान युद्ध शुरु हो जाता है । इस युद्ध को 'प्लासी का युद्ध' कहते हैं । युद्ध शुरू होते ही अंग्रेज सिराजुद्दोला के विश्वासपात्र मीर मदान को मार डालते हैं । अब सिराजुदौला अपने सेनापति मीर जाफर को अंग्रेजों से संधि करने के लिए एक पैगाम भेजता है । पैगाम मिलते ही मीर जाफर तुरंत युद्ध रूकवा देता है । नवाब की फौज वापस अपने कैंप में जाने लगती है । तभी पीछे से मीरजाफर क्लाइव की ओर इशारा करके उसे पूरी स्थिति समझा देता है । क्लाइव दुबारा से पूरी सेना के साथ नवाब पर हमला करने टूट पडता है । अचानक हुए हमले के कारण सिराजुद्दोला की सेना बौखलाकर तितर-बितर हो जाती है । नवाब सिराजुद्दोला मैदान छोड़कर भागने के लिए विवश हो जाता है । मीरजाफर तुरंत अंग्रेजों के पास पहुंच जाता है । एग्रीमेंट के मुताबिक अंग्रेजों उसे बंगाल का नवाब बना देते हैं । नवाब सिराजुद्दोला को  पटना में मीरजाफर  के सैनिक पकड़ लेते हैं ।  और फिर उसे मुर्शिदाबाद लाया जाता है । जहां पर मीरजाफर का पुत्र मीरन सिराजुदौला को फांसी पर लटकाने का हुक्म देता है  2 जुलाई 1757 को बंगाल के नवाव सिराजुदौला को फांसी देदी जाती  है । और दूसरे दिन उसकी लाश को हाथी पर चढ़ाकर पूरे मुर्शिदाबाद शहर में परेड कराई जाती है ।  इस युद्ध के बाद से ही भारत की गुलामी की कहानी शुरू हो जाती है ।

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